Kill Review:  सती के गम में जो तांडव शिवजी ने किया था, वैसा ही तांडव  फिल्म  ‘किल’ में हीरो ने प्रेमिका की हत्‍या के बाद किया, विरह की आग में खत्म कर दिए लुटेरों के खानदान के खानदान 

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Movie Review किल: BY basant chouhan 
कलाकार # लक्ष्य , राघव जुयाल , तान्या मानिकताला , अभिषेक चौहान , आशीष विद्यार्थी , हर्ष छाया और अद्रिजा सिन्हा
लेखक # निखिल नागेश भट्ट और आयशा सैयद
निर्देशक # निखिल नागेश भट्ट
निर्माता # गुनीत मोंगा कपूर , अचिन जैन , करण जौहर और अपूर्व मेहता
रिलीज: 5 जुलाई 2024
रेटिंग : 4/5

एक नई फिल्म आई है ‘किल’। जब में मोबाइल पर मिर्जापुर 3 देख रहा था तो मेरे एक मित्र ने कहा फिल्म ‘किल’भी देखो।
चूंकि फिल्म देखने अच्‍छा लगता है तो ‘किल’भी देख ली।
‘किल’ 05 जुलाई को रिलीज हो चुकी है, लेकिन दर्शकों तक ठीक से पहुंच नहीं पाई। पर अब माउथ पब्लिसिटी से यह दौड पडी है।
अब आपको ‘किल’के बारे में बताते हैं…

गांवों में जब मेला लगता था तब एनांसमेंट रिक्‍शे पर बजता था, वह चेतावनी होती कि कमजोर दिल के लोग और गर्भवती स्त्रियां मेला में मौत के कुंआ को न देखें। ऐसी ही कुछ वैधानिक चेतावनी फिल्म ‘किल’ के ट्रेलर के साथ भी जारी की गई थी। इस फिल्म में सभी रस मौजूद हैं। श्रृंगार, हास्य, करुण और शांत रसों के के साथ ही रौद्र, वीर, भयानक और वीभत्स रसों की भरमार है। इन सभी रसों में मिलकर बनी है फिल्म बनी हैं किल। यह केवल वयस्कों के लिए है और फिल्म ‘एनिमल’ को सुपरहिट बनाने वाले दर्शकों के लिए इस साल का बेहतरीन सिनेमाई तोहफा है।

अभी तो ये अंगड़ाई है…
न्‍यूज वेबसाइट अमर उजाला का है इस फिल्म के बारे में कहना है कि नई सदी के चौबीसवें साल में हिंदी सिनेमा की ये नई अंगड़ाई है। और, इससे ये भी संकेत मिलता है कि असल पुरवाई हिंदी सिनेमा की अब आने वाली है। भारतीय सिनेमा विदेश में भी अब तक शाहरुख खान के सहारे ही अटका रहा है। लेकिन, सितारों का सम्मोहन दर्शकों के मन मंदिर से हट रहा है, वे कहानियों और उन्हें कहने के तरीकों पर फिदा हो रहे हैं। ‘किल’ हिंसात्मक दृश्यों के मामले में ‘एनिमल’ पर भारी है और छोटे परदे पर खूब नाम कमाने के बाद इस फिल्म से बड़े परदे पर अपनी बोहनी कर रहे अभिनेता लक्ष्य की मासूमियत भी रणबीर कपूर से कम नहीं है। सनद ये भी रहे कि धर्मा प्रोडक्शन्स से घोषित उनकी दो फिल्में ‘दोस्ताना 2’ और ‘बेधड़क’ तमाम शोरगुल के बाद भी पूरी नहीं हो सकी हैं।

रूप तेरा मस्ताना, प्यार मेरा दीवाना…
एक मासूम इंसान के पास जब खोने को कुछ नहीं होता तो वह या तो बहुत हिंसक हो जाता है या फिर बिल्कुल शांत। फिल्म ‘किल’ की कहानी एनएसजी कमांडोज के अपनी यूनिट लौटने से शुरू होती है जहां अपना मोबाइल स्विच ऑन करते ही कैप्टन अमृत राठौड़ को अपनी प्रेमिका की रांची में सगाई करने की खबर मिलती है। वह रांची भागता है। वह वहां से प्रेमिका को भगाना चाहता है। ‘मिशन’ में साथ देने उसका कमांडो दोस्त विरेश भी आया है, लेकिन ऐन मौके पर लड़की को पिता का डर सताता है। वह तैयार नहीं होती है तो अमृत भी मिशन ‘अबॉर्ट’ कर देता है। सब अब दिल्ली लौट रहे हैं। एक ही ट्रेन में हैं। रांची से चली राजधानी एक्सप्रेस पर अगले स्टेशन से ही तीन चार दर्जन बदमाश चढ़ जाते हैं। जैमर से मोबाइल नेटवर्क फेल करके डकैती डालना इनका मकसद है, बस इस सबके बीच एक हादसा ऐसा हो जाता है कि ‘रक्षक’ ही ‘राक्षस’ बन जाता है। कुछ घंटे पहले तक अपनी प्रेमिका से कूची कूची रकमा कर रहा हीरो जैसे ही अपना रूप बदलता है, फिल्म में लाशों के ढेर लगते जाते हैं। मरने वालों के शरीर ऐसी ऐसी जगहों से टूटते, फूटते और रूप बदलते हैं कि एक बार तो देखकर ही सिहरन हो जाती है। और, विलेन को भी कहना पड़ ही जाता है, ‘ऐसे कौन मारता है बे!’

…जब हिंसा भी सम्मोहक लगे
जी हां, बहुत मजबूत कलेजा चाहिए फिल्म ‘किल’ को देखने के लिए। लेकिन, इस फिल्म का मनोविज्ञान कुछ और भी है। निखिल नागेश भट्ट ने अपनी कहानी की पटकथा को कुछ इस तरह आगे बढ़ाया है कि बदमाशों के हाथों हुआ अत्याचार वह पहले दिखाते हैं और फिर इसकी प्रतिक्रिया को इस हद दरजे का हिंसक बनाते हैं कि इस तांडव में भी दर्शकों का मनोरंजन होने लगता है। तांडव समझते हैं ना आप? सती के आत्मदाह करने के बाद क्रोधित शिव की फुंकार! वैसा ही कुछ यहां अमृत है। फायर एक्सट्गिंविशर से जब वह एक बदमाश के सिर को पीट पीटकर पराठा बना देता है तो वीभत्स रस के सारे अवयव होने के बाद भी दर्शक इसमें नायक का वीरत्व देख रहे होते हैं। कहानी में अमृत और तूलिका के रोमांस की अंतर्धारा है और एक बार तो लगता भी है कि अपने मिलन की चौथी एनीवर्सरी मनाने के नाम पर दोनों गाना तो नहीं गा देंगे, लेकिन निखिल ऐसा कुछ नहीं करते। पूरी फिल्म में शायद एक गाना है जो बैकग्राउंड में बजता है, जाको राखे साइयां जैसा कुछ कुछ…!

फाइनली आ गए नए नायक और खलनायक:
फिल्म के पूरे रोमांच को जीने में इस फिल्म से अपनी अभिनय यात्रा शुरू कर रहे लक्ष्य ने बहुत मेहनत की है। फिल्म को शुरू से आखिर तक अपने कंधे पर संभालकर भागते लक्ष्य ने ये भी साबित किया है कि एक एक्शन स्टार बनने के लिए सिर्फ और सिर्फ एक अच्छी कहानी और एक ऐसा भौगोलिक क्षेत्र चाहिए जिसमें दर्शक खुद को हीरो के साथ फंसा हुआ महसूस कर सके। निखिल ने हिंदी सिनेमा को लक्ष्य के रूप में एक नया स्टार दिया है। और इसी फिल्म से हिंदी सिनेमा को एक नया खलनायक भी राघव जुयाल के रूप में मिला है। गुनीत मोंगा ने टीवी के दो बॉय नेक्स्ट डोर लड़कों को उठाकर एक्शन स्टार बना दिया है। राघव जुयाल के चेहरे के भावों की क्रूरता बहुत ज्यादा डराती है। फणी का अपने पिता के साथ मसखरी का अंदाज भी राघव जुयाल ने अच्छे से जिया है।

 

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